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धैर्य की परीक्षा

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mayankkumar


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दीपू …..एक सच्चा पागल

Posted On: 25 Nov, 2012  
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आयिंदा न आएं आमिर अजमल कसाब

Posted On: 22 Nov, 2012  
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दियों से दूर होती …….. दीपावली

Posted On: 10 Nov, 2012  
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प्रत्यक्ष विदेषी ’कलेष’

Posted On: 6 Oct, 2012  
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हिंदी

Posted On: 14 Sep, 2012  
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इस रफ्तार को गिरफ्तार कर लो

Posted On: 6 Sep, 2012  
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बाॅलीवुड के ’सुदामा’ थे ए.के. हंगल

Posted On: 29 Aug, 2012  
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व्यथा ……एक बेटी की !

Posted On: 25 Aug, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

बात सोलह आने सही है कि अभी डूबा नहीं......मैं राजनीति का मर्मज्ञ तो नहीं हूँ परंतु समझता हूँ कि नेतृत्व की वजह से ही कांग्रेस की आज दुर्दशा हो रही है| अब प्रियंका को लाकर भी कुछ ज़्यादा बदलने वाला नहीं, वह भी श्री नरेंद्र मोदी के बेटी कहने पर अपने उत्तर में अपनी दंभता का परीचय दे चुकी हैं| उससे पहले जनता के दिलों में उनकी छवि अलग ही थी| न जाने इस परिवार के हाथ में अन्य नेताओं की कौन सी दुखती रग है कि वे लोग इनका मोह छोड़ ही नहीं पा रहे| मुझे एतराज परिवार से नहीं उनकी अब तक की रिपोर्ट कार्ड से है जिसे अन्य कांग्रेसी नेता पढ़ ही नहीं पा रहे या उसे नज़र अंदाज कर रहे हैं| परंतु उनका ये व्यवहार कांग्रेस के लिए घातक सिद्ध होगा एक दिन| आपका प्रयास सराहनीय है व लेखन भी कसा हुआ और सुघड़ है| बहुत बहुत साधुवाद|

के द्वारा: bhagwandassmendiratta bhagwandassmendiratta

के द्वारा: mayankkumar mayankkumar

दुनिया को वैश्विक गांव बनाने के दावे करने वाले इंटरनेट पर जब ’चुंबन’ शब्द के मायने खोजने की कोशिश की तो विकीपीडिया ने इसका इतिहास परोस दिया। लगभग 22 तरीके के चुंबन यहां बताए गए। होंठों से लेकर जीभ तक, चेहरे से लेकर तलबों तक और तमाम नुस्खों-नज़रियों को पिरोकर चुंबन की चिंताएं और सावधानियां भी लिखीं पड़ीं हैं। किसिंग-टिप्स की लंबी-चैढ़ी लिस्ट यहां सिर्फ इंटरनेट का मददगार होना साबित नहीं करती, यह भी ज़ाहिर करती है कि इंटरनेट यूज़र्स के दमदार रिस्पांस से ही चुंबन के इन नायाब नुस्खों को यहां सार्वजनिक किया गया है। तरीके और तस्वीरों ने इस शब्द के ढेरों मायने गढ़ दिए हैं, पर कामुकता की जकड़ से इसे छुड़ाने में इंटरनेट का पक्षी भी बुरी तरह हांफ गया है। काले बोल्ड अक्षरों में यह चेतावनी मेरी नज़रों से बच नहीं पाई कि ’’चुंबन के दौरान आपके मुंह से बदबू कतई नहीं आनी चाहिए, अन्यथा आप इसके ’सुख’ से बेदखल किए जा सकते हैं।’’ कई डॉक्टरों और शोधकर्ताओं ने कुछ नए कारनामे भी लिखे हैं, जो चुंबन को शिद्दत से अंजाम देने का भरोसा दे रहे हैं। ’’जोश के साथ इसे लेने से आप अपना वजन घटा सकते हैं। किसिंग से आप प्रतिमिनट कम से कम 6.4 कैलोरी खर्च करते हैं।’’ जैसे कई तथ्य ’चुंबन-लिस्ट’ के साथ चिपका दिए गए हैं। किसिंग का प्रमोशन और विज्ञापन कर रहे इंटरनेट को यहीं तसल्ली नहीं हुई है। कुछ तस्वीरों के ज़रिए उसने यूज़र्स खींचने के लिए नायक-नायिका की तस्वीरों का कटीला-कातिलाना जाल भी बिछा रखा है।बड़े विचित्र विषय पर सार्थक लेखन दिया है आपने मयंक कुमार जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: mayankkumar mayankkumar

के द्वारा: abhijeettrivedi abhijeettrivedi

आज जरुरत है जब भी कोई दुष्कर्मी विदेशी अतिथियों के साथ दुर्ब्याव्हार करता पकड़ा जाये उसको फ़ौरन उस देश के अदालत और कानून के हवाले कर दिया जाये क्यूंकि मेरी नजर में यह भी देश द्रोह से कम अपराध नहीं है और अपने यहाँ कानून कैसे काम कर रहा है किसीसे छिपा नहीं है यहाँ फैसला होने में इतने वर्ष गुजर जाते हैं की उसे न्याय कहना न्याय का अपमान ही कहा जायेगा अतः विदेशी सैलानियों खासकर विदेशी महिला के साथ अपराध और दुष्कर्म के मामले को अपने देश के बजाय अपराधी को उस देश को सौपा जाये जिसके खिलाफ उसने अपराध किया हो फिर जरुर ऐसे अपराध करने में लोग डरेंगे एक अच्छा लेख मेरी यह स्वतन्त्र राय है

के द्वारा: ashokkumardubey ashokkumardubey

साल दर साल बढ़ रहे मेहमानों पर दुष्कर्म के इन गंभीर मामलों पर रोक की उम्मीद सिर्फ सरकार या प्रशासन पर ही छोड़ देना असल में बेइमानी होगी। हमें तमाम समाजिक सरकारी व गैरसरकारी संगठनों की मदद लेकर कैंपेनिंग व जागरुकता अभियान चलाने होंगे, हमें गला फाड़कर संदेश देना होगा कि मेहमानबाज़ी आज भी भारत में उसी स्तर पर है, जैसे सपने सालों पहले यहां के महापुरुषों ने देखे थे। कानून को सख्त करने की पहल में हमें तमाम कानूनविदों की मदद से फाॅरेन मामलों के फास्ट्रैक कोर्ट खड़े करने होंगे, जो मामले का निष्पक्ष और त्वरित निपटारा कर सकें। विदेशी दूतावासों को खासतौर पर सरकार से विदेशी मेहमानों की सुरक्षा का जि़म्मा सुनिश्चित करवाना होगा। मामलों के दोषियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की आवाज़ बुलंद करनी होगी। स्पष्ट और सार्थक लेखन श्री मयंक कुमार जी

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के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

के द्वारा: mayankkumar mayankkumar

के द्वारा: abhijeettrivedi abhijeettrivedi

किसी महिला के साथ विकृत मानसिकता के बीमार लोग जब जबरदस्ती करते हैं ,तो उस महिला के लिए हमारा समाज इतना कड़ा रवैया क्यों अपना लेता हैं , छोटी मोटी शारीरिक क्षति हमारा शरीर खुद सही कर लेता हैं , क्यों लगातार उसका मानसिक बलात्कार करता रहता हैं ,क्यों उसको एहसास दिलाता रहता हैं कि तू विक्टिम हैं और अब कोई भला लड़का/परिवार तुझे नही मिलेंगा आदि आदि …..क्या यौन अंगों की शुचिता का प्रश्न सिर्फ महिलाओ के लिए हैं ?जिन्हें इस देश में आदि काल से देवी के रूप में पूजा जाता रहा हैं |सड़को पर,चलती बसों में हर जगह महफूज क्यूँ नही हैं औरते ?और इस बीमारी का इलाज क्या हैं ? "माँ,बहन,बेटी या महबूब के साये से जुदा, एक लम्हा न हो, उम्मीद करता रहता हूँ एक औरत है मेरी रूह में सदियों से दफ़न , हर सदा जिस कि,मैं बस गीत करता रहता हूँ …!"

के द्वारा: ajaykr ajaykr

भारतीय परम्पराओं को तोड़ मरोड़ देने को आतुर तो कई लोग हैं . परम्पराओं को तोड़ कर आधुनिक कहलाना भी कई लोगों का शौक है . किन्तु समाज के नियम, जो व्यवस्था के लिए बने हैं बदल देने के लिए किसी के जीवन को व्यवस्थित कर दें, इस में कोई बुराई नहीं किन्तु एक टीवी धारावाहिक को प्रमाण बना देने में मुझे समझदारी नहीं दिखाई देती है . यदि धारावाहिकों को आदर्श बना लिया जाये तो हाल में हरिद्वार में टीवी धारावाहिक "गुमराह" को देख कर एक बारहवीं के छात्र ने दूसरी कक्षा की छात्रा की ह्त्या पैसे के लालच में कर दी. और समाज में परिवर्तन के नाम पर आधुनिकता को ओढने को तैयार "प्रोग्रेसिव माइंड्स " क्या नयी परम्पराओं के "साइड इफेक्ट्स" भी सामने लायेंगे? यह सही है कि अनेक बातें हैं समाज में जो नारी जीवन को अर्थ देने को बाधित करती हैं . किन्तु धारावाहिक / टीवी सीरियल को आदर्श मान लेना स्वीकार्य नहीं.

के द्वारा: dhananjaynautiyal dhananjaynautiyal

के द्वारा: tejwanig tejwanig

के द्वारा: mayankkumar mayankkumar

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: nishamittal nishamittal

मयंक भाई ,नमस्कार आपकी  रचना बहुत अच्छा व्यंग्य हैं ,मैंने वासी सह की एक रचना पढ़ी थी- मुहब्बत अखिरिश है क्या ? वसी ! मैं हंस के कहता हूँ - किसी प्यासे को अपने हिस्से का पानी पिलाना भी ..मुहब्बत है ! भंवर मे डूबते को साहिल तक लाना भी ..मुहब्बत है ! किसी के वास्ते नन्ही सी क़ुरबानी .मुहब्बत है ! कहीं हम राज़ सारे खोल सकते हों मगर फिर भी , किसी की बेबसी को देख कर खामोश होजाना भी …मुहब्बत है ! हो दिल मे दर्द , वीरानी मगर फिर भी किसी के वास्ते जबरन ही मुस्कराना भिओ मुहब्बत है ! कहीं बारिश मे भीगते बिल्ली के बच्चे को ज़रा सी देर को घर में ले आना , भी मुहब्बत है ! कोई चिडया जो कमरे में भटकती आ गयी हो उस को पंखा बंद कर , रास्ता बाहर का दिखलाना ,मुहब्बत है ! किसी का ज़ख़्म सहलाना , किसी के दिल को बहलाना .. मुहब्बत है ! मीठा बोल , मीठी बात , मीठे लब्ज़ सब क्या है ? मुहब्बत है ! मुहब्बत एक ही बस एक ही इंसान की खातिर मगन रहना , कब है ? मुहब्बत के हजारों रंग , लाखों रूप हैं किसी भी रंग में , हो जो हमें अपना बनती है ये मेरे दिल को भाती है .......... > [वसी शाह ]

के द्वारा: ajaykr ajaykr

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मयंक भाई, बड़े बड़े ओहदों पर बैठे लोगों ने जिस तरह से देश को लूटा है उसके सामने मुझे इस बात से कोई दुःख नहीं की अन्ना जी ने विटामिन मिला पानी पिया, कम से कम इस देश के लोगों का खून तो नहीं पी रहे जो की बाकी जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग कर रहे हैं, बाकी देश के लोग अन्ना के साथ इसलिए हैं क्योंकि उनका उद्देश्य या उनका काम गलत नहीं था, हाँ हो सकता है रास्ते में कुछ खराबी हो! गांधी और अन्ना में कम से कम एक बात की तो समानता है ही की दोनों में विलासी जीवन का त्याग किया और आम जनता के हित के लिए आन्दोलन किये...चाहे भले ही अपना नाम करने के लिए ही किया हो! मेरे ख्याल से न तो तुम्हे गांधी के बारे में और न ही अन्ना के बारे में बहुत ज्यादा ज्ञान होगा...और हमें सिर्फ एक दो छोटी-छोटी बातों पर ही सारा ध्यान केन्द्रित कर किसी के बारे में कोई निश्चित राय नहीं बनानी चाहिए....अभी और पढो गांधी को भी और अन्ना को भी,

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

मयंक भाई बहुत सटीक व्यंग्य किया है आपने, गलती समाज की तो है ही उससे कही ज्यादा परिवार वालों की भी गलती है, जब हम अपने बच्चों से बात करेंगे, उनकी बातों को समझेंगे तभी वे भी कोई भी कदम उठाने से पहले हमसे बात करेंगे, उस समय सभी को मिलकर तय करना चाहिए क्या सही क्या गलत? बाकी शादी जिन दो लोगों की व्यक्तिगत जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण फैसला है जब तक उन्हें इस मामले में ज्यादा अधिकार नहीं दिए जायेगे....ऐसी घटनाएं घटती ही रहेंगी.... इसलिए सभी अभिभावकों से अनुरोध है पहले तो स्वयं बच्चो से बात-चीत का माहौल बना कर रखिये, फिर बच्चों की भावनाओं को भी समझिये तथा इस बात को ज़रूर समझिये की शादी से सबसे ज्यादा लेना-देना उसी का है जिस पर की ये आफत आने वाली है....और इस आफत को उठाने के लिए बड़ा दम होना चाहिए...इसलिए नवयुवक और नवयुवतियों से अनुरोध है की जब अपने पैरों पर खड़े हो जाएँ तभी कोई कदम आगे बढायें

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

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मयंक कुमार जी नमस्कार, अन्ना जी का मोटिव वास्तव में क्या है ये मुझे आज तक स्पष्ट नही हो पाया इसीलिए मैं ने कभी इस तरह के मैसेजेस पर अंधों की तरह मैसेज बैक या मिस्ड कॉल कभी नहीं की ..लेकिन कुछ न कुछ तो वो कर ही रहे होंगे, बुज़ुर्ग हैं, जान पर खेलना कोई अच्छी बात नहीं , यदि गाड़ी या मिनरल वाटर का प्रयोग करते हैं तो क्या बुरा है..100 % न सही पर कुछ तो अच्छा होगा ही, वर्ना सरकारी गाड़ियों का दुरूपयोग तो मेम साहबों द्वारा शॉपिंग, पिकनिक या और व्यक्तिगत कामो मे भी जी भर के होता है.. गाँधी जी और जे पी साहब के ज़माने में अगर ये सुविधा होती तो शायद उन्हों ने भी उठाई होती... आप ने पढ़ा ही होगा , गाँधी जी सर्व धर्म भोज के आयोजनों में जमादारों के हाथ का बनाया सार्वजानिक खाना न खा कर अपना विशेष "व्रत " वाला खाना खाते थे..

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