dhairya

धैर्य की परीक्षा

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हां मैं कैदी हूं !

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बहस ही तो थी बवाल क्‍यूं किया
था मैं भी तो इंसां
क्‍या बदला था ये
जो कुचल दिया, मसल दिया

था वो भी कैदी, मैं भी कैदी
थे दोनों ही इक रूह
क्‍या हमला था ये
जो कुचल दिया, मसल दिया

उसने ही बनाया था यूं
सरबजीत को, मुझे भी
क्‍या जुमला था ये
जो कुचल दिया, मसल दिया

अल्‍लाह की मर्जी रही होगी
कहते हैं जेहन में रहता है वो
क्‍या कत्‍ल था ये
जो कुचल दिया, मसल दिया

मेरी जुबान ही तो चली थी
क्‍या हक नहीं था मुझे
क्‍या सियासत की बू थी
जो कुचल दिया, मसल दिया ।

-सनाउल्‍लाह ।

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sushma Gupta के द्वारा
June 1, 2013

प्रिय मयंक जी, एक पराये मुल्क के कैदी सनाउल्लाह के कत्लेआम पर आपकी संवेदना मानवता के प्रति सच्ची ईमानदारी ही तो है ,यही बात यदि हर इंसान की समझ में आ जाए तो दुनियाँ खुबसूरत बन जाए … मेरे ब्लॉग पर भी आपकी प्रतिक्रिया का इन्तजार …

harirawat के द्वारा
May 9, 2013

दिल को छूने वाली कविता. ! चलते चलो मंजिल की तरफ, रास्ता है कठिन, महीनो लगेंगे वर्ष लगेगा या हजारों दिन, केवल मंजिल तक पहुंचना मेरा मकसद नहीं है, क्यों की जिस्म चल रहा है यहाँ पर मन कहीं है ! शुभ कामनाओं के साथ हरेन्द्र


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